LAW'S VERDICT

चयन के 10 साल बाद नियुक्ति नहीं की जा सकती रद्द


ज्यादा अंक पाने वाली ST महिला को हाईकोर्ट का राहत देने से इनकार, याचिका खारिज 

जबलपुर। सीहोर जिला सत्र न्यायालय में दस साल पहले हुई नियुक्तियों से जुड़े मामले पर मप्र हाईकोर्ट ने ST वर्ग की उस महिला को राहत देने से इंकार कर दिया, जिसे ज्यादा अंक मिलने के बाद भी नियुक्ति नहीं मिली थी। महिला की याचिका खारिज करके जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने कहा कि दस साल का वक़्त बीत जाने के बाद अब नियुक्ति प्रक्रिया में दखल नहीं दिया जा सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि चयनित उम्मीदवार की नियुक्ति को चुनौती नहीं दी गई। चयनित अभ्यर्थी को पक्षकार भी नहीं बनाया गया और पद पहले ही भर चुका है। ऐसी परिस्थिति में अब मामले पर न तो अब दखल और न ही याचिकाकर्ता को अब नियुक्ति का अधिकार दिया जा सकता है।

चपरासी पद पर नियुक्ति का मामला 

खरगोन जिले के मोगरगाँव भगवानपुरा में रहने वाली निर्मला चौहान ने यह याचिका वर्ष 2016 में दाखिल की थी। आवेदक का कहना था कि सीहोर जिला सत्र न्यायालय में चपरासी, चौकीदार, वाटरमैन और माली के पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी हुआ था। याचिकाकर्ता ने चपरासी के पद पर आवेदन भरा था। उसने परीक्षा में 20 अंक प्राप्त किए। चयन सूची में उसका नाम क्रमांक 3 पर था। अनारक्षित (महिला) वर्ग के लिए तीन पद विज्ञापित थे। अंतिम चयन में दर्शना शर्मा – 25 अंक, अरना राजोरिया – 20 अंक और रुचि विश्वकर्मा – 17 अंक को नियुक्ति दी गई, जबकि 20 अंक पाने वाली याचिकाकर्ता को नियुक्ति से वंचित किया गया। याचिकाकर्ता ने चपरासी पद पर नियुक्ति न दिए जाने को चुनौती दी थी, जबकि उसने अनारक्षित (UR) महिला वर्ग की अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक प्राप्त किए थे।

याचिकाकर्ता का तर्क

याचिकाकर्ता के कहना था कि विज्ञापन में ST (महिला) के लिए कोई पद आरक्षित नहीं था। उन्होंने अनारक्षित (महिला) वर्ग की अंतिम चयनित उम्मीदवार से अधिक अंक हासिल किए। "ओपन कैटेगरी" सभी के लिए होती है, यह कोई कोटा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, अधिक मेरिट वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को अनारक्षित श्रेणी में स्थान मिलना चाहिए। याचिकाकर्ता का यह भी कहा था कि यह “माइग्रेशन” का मामला नहीं है, बल्कि मेरिट के आधार पर सामान्य सूची में स्थान पाने का अधिकार है।

यह हॉरिजॉन्टल रिजर्वेशन का मामला 

वहीं अनावेदकों की ओर से अधिवक्ता पराग तिवारी का तर्क था कि महिला आरक्षण,  Horizontal Reservation है, इसलिए आरक्षित वर्ग की महिला को सीधे अनारक्षित सूची में शामिल नहीं किया जा सकता।

अब नियुक्ति नहीं हो सकती रद्द 

उभय पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भले ही बाद में कानूनी स्थिति बदली हो, परंतु दस साल पहले की वैध प्रक्रिया के आधार पर हुई नियुक्ति को दस वर्ष बाद रद्द नहीं किया जा सकता।  इस मत के साथ डिवीज़न बेंच ने याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट का आदेश देखें   WP-7179-2016

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